ब्रह्मज्ञान का अधिकारी
एक साधक ने किसी महात्मा के पास जाकर उनसे प्रार्थना की कि 'मुझे आत्मसाक्षात्कार का उपाय बताइये। महात्मा ने एक मंत्र बताकर कहा कि ' एकांत में रहकर एक साल तक इस मंत्र का जाप करो; जिस दिन वर्ष पूरा हो, उस दिन नहाकर मेरे पास आना '. साधक ने वैसा ही किया। वर्ष पूरा होने के दिन महात्मा जी ने वहां झाड़ू देने वाली भंगिन से कह दिया कि जब वह नहा - धोकर मेरे पास आने लगे तब उसके पास जाकर झाड़ू से गर्दा उड़ाना। भंगिन ने वैसा ही किया। साधक को गुस्सा आ गया और वह भंगिन को मारने के लिए दौड़ा। भंगिन भाग गयी। वह फिर से नहाकर महात्मा जी के पास आया। महात्माजी ने कहा-'भैया! अभी तो तुम साँप की तरह काटने दौड़ते हो। साल भर और बैठकर मंत्र-जप करो तब आना।' साधक को बात कुछ बुरी तो लगी, पर वह गुरु की आज्ञा समझकर चला गया और मंत्र जप करने लगा। दूसरा वर्ष जिस दिन पूरा होता था, उस दिन महात्मा जी ने उसी भंगिन से कहा कि आज जब वह आने लगे तो उसके पैरों से झाड़ू छुआ देना। उसने कहा, 'मुझे मारेगा तो?' महात्मा जी ने बोले ' आज मारेगा नहीं, बक कर ही रह जायेगा। ' भंगिन ने जाकर झाड़ू छुआ...