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Showing posts from 2020

प्यार करो पर प्यार न माँगो

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प्यार करो पर प्यार न माँगो , प्यार करो पर प्यार न माँगो,,, गैरो से क्या अपनों से भी सपनों का संसार न माँगो,, प्यार करो पर प्यार न माँगो,,, तुम्हे दिखाई देती है जो, बसी हुई बस्ती यारो की,, धौखे में मत आ जाना, ये दुनियाँ है दुकानदारो की,,, व्यवसायी से निश्चल मन का, प्रेमभरा व्यवहार न माँगो,, प्यार करो पर प्यार न माँगो,,, सोचो तनिक कामना अपनी, जीवन में दुःख-सुख भरती है,, नहीं दूसरा दोषी कोई, आशा ही निराश करती है,,, मुक्ति का उपाय सोचो, कुछ भुक्ति का भण्ङार न माँगो,, प्यार करो पर प्यार न माँगो,,, जिसने जगत् बनाया जग में, उसकी ही इच्छा चलती है,, बात कभी की अलग हमेशा, दिल की दाल नहीं गलती है,,, क्षणभंगुर विषयो से सुख का, स्थायी आधार न माँगो,, प्यार करो पर प्यार न माँगो,,, जग को हरि का रुप समझकर, मन में भाव भक्ति का भरदो,, हरि की सत्ता सिंधु सरित सा, अपना अहं विसर्जित कर दो,,, छुट जाएगा रोना, अपने होने का अधिकार न माँगो,, प्यार करो पर प्यार न माँगो,,, देखों फलदायी वृक्षों को, कितने नम्र रहा करते है,, फलवाले होकर पत्थर का, कठिन प्रहार सहा कर...

उत्तम समय, सबसे बढ़िया काम और सबसे बढ़िया व्यक्ति

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आज के मनुष्य को उसकी दुष्ट इच्छाओं- वासनाओं ने इतना त्रस्त कर रखा है की वह पद- पद पर चिंताओं, परेशानियों, समस्याओं एवं दुखों–कष्टों के थपेड़े खाता रहता है | वह सच्चा जीवन जीने का ढंग ही भूल चुका है।   जो सचमुच अपने जीवन का महत्त्व समझतें है वे जिससे अपना कल्याण हो ऐसा संग करतें   है, ऐसा दिव्य विचार करतें है | राजा सुषेण को विचार आया की ‘मै जीवन का रहस्य समझने वाले किसी महात्मा की शरण में जाऊँ | पंडित लोग मेरे मन का वहम दूर नहीं कर सकते |’ राजा सुषेण गांव के बाहर ठहरे हुए एक वेदान्ती महात्मा के पास पहुंचे | उस समय महात्मा अपनी वाटिका में सेवा कर रहे थे , पेड़ पौधे लगा रहे थे | राजा बोले : “ बाबाजी ! मैं कुछ प्रश्नों का समाधान चाहता हूँ |” बाबाजी : “ मेरे पास अभी समय नहीं है | मुझे अपनी वाटिका बनानी है |” राजा ने सोचा कि ‘बाबाजी अभी काम कर रहे है और हम चुप चाप बैठे यह ठीक नहीं |’ राजा ने भी कुदाली फावड़ा उठाया और काम करने लगे | इतने में ही एक आदमी भागता भागता आया और आश्रम में शरण लेने को घुसा तथा गिरकर बेहोश हो गया | महात्मा ने उसे उठाया | उसके सर पर चोट लग...

भगवान का साक्षात्कार

       “भगवान् वेदव्यासजी ने भी कहा है की अगर तुम्हे संसार में सुखी होना हो तो इन चार बातो को ठीक से समझ लो | इन चार बातों से संपन्न होकर जगत का व्यवहार करो  …………………. “                       परम भक्ति पाना  हो, परम सुख पाना हो , परम तत्व को पाना हो , ब्रह्मज्ञान को पाना हो तो भक्त को  कैसा बनना चाहिए ?             भक्त की पहचान क्या है ? जो परमात्मा से , अकाल पुरुष से अपने विभक्त नहीं मानता – जानता वह उत्तम भक्त है | ऐसा उत्तम भक्त , परम भक्त कैसा होता है ? भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है :      अद्वेष्टा  सर्वभूतानां  मैत्र :  करुण  एव   च |        निर्ममो निरहंकारः समदु:खसुख : क्षमी ||                                       ...

जीवन में ईश्वर-प्राप्ति

परमात्म – प्राप्ति अत्यंत सरल है किन्तु गलत अभ्यास के कारण कठीन लग रही है I जब तक हमें यह बात समझ में नहीं आती की परिस्थिति जीवन नहीं है और जीवन परिस्थिति नहीं है तब तक परमपद की कुंजी नहीं मिलती I                 जीवन उसे कहा जाता है जिसे मौत छू तक न सके , जहां कोई भी दुःख , क्लेश और मुसीबत फटक  तक न सके I  परिस्थिति को मौत छू सकती है , जीवन को नहीं , किन्तु हम परिस्थिति को ही जीवन मानने की गलती कर बैठते है , इसीलिए परिस्थिति से बंध जाते है I   परिस्थितियों का बँधन ही हमें भयभीत कर देता है, आसक्त कर देता है और परेशान कर देता है I  यदि इन दोनों का भेद समझमे आ जाए तो सब दुखो की निवृत्ति हो जाए I                  अगर आप प्रत्यक्ष  रूप से यह जान लो की परिस्थिति जीवन की है तो कोई भी परिस्थिति आपको प्रभावित नहीं कर सकती I  साथ में यह लाभ भी होगा की आपका दुःख का भय चला जाएगा I  चाहे कैसी भी परिस्थिति आये, किन्तु यदि हमारी यह समझ बनी रहे की जो अवस्था आई है वह एक दिन...

सुखी, स्वस्थ एवं सम्मानित जीवन के आधार

 “उ सीका जीवन सफल है जिसके जीवन में दृढ़ता है | उसीका जीवन सफल है जिसके जीवन में सत्संग के लिए स्नेह है | उसीका मनुष्य जन्म सफल है जिसके जीवन में सादगी , सच्चाई और प्रवित्रता है , जीवन व्यसनों से मुक्त है | उसे अनुकुलताएँ बाँध नहीं सकती और प्रतिकुलताएँ डिगा नहीं सकती |”                  एक बार घूमते-घूमते कालिदास बाजार गये | वहाँ एक महिला बैठी मिली | उसके पास एक मटका था और कुछ प्यालियाँ पड़ी थी | कालिदास ने उस महिला से पूछा : ” क्या बेच रही हो ? ”           महिला ने जवाब दिया : ” महाराज ! मैं पाप बेचती हूँ | “           कालिदास ने आश्चर्यचकित होकर पूछा : ” पाप और मटके में ? “           महिला बोली : ” हाँ , महाराज ! मटके में पाप है | ”           कालिदास : ” कौन-सा पाप है ? “           महिला : ” आठ पाप इस मटके में है | मैं चिल्लाकर कहती हूँ की म...

दक्षता के लिए चाटूकारिता से बचिये

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    प्रभावशीलता एवं दक्षता प्राप्त करना प्रबंधन की मूल चुनौतियाँ हैं। व्यक्ति से व्यवस्था प्रभावित होती है। जैसा मुखिया होता है, संगठन वैसा ही होने लगता है। एक क्रोधी एवं अव्यवस्थित अधिकारी अपने संगठन एवं परिवेश को भी वैसा ही बना देता है, इसके  विपरीत शांतचित्त, प्रसन्न एवं सृजनशील अधिकारी अपने संगठन को प्रगति की दिशा में खींचता है। अतः  प्रभावशीलता एवं दक्षता प्राप्त करने के लिए दो दिशाओं से प्रयत्न करना चाहिए― तंत्र एवं व्यवस्था उत्तम बने तथा उसे चलानेवाला व्यक्ति  विकसित हो।      यदि व्यवस्था चलाने वाले व्यक्ति की मानवीय कमजोरियों उस पर प्रभावी होती रहेंगी तो न वह स्वतः उन्नति कर सकेगा और न ही अपने संगठन को अच्छा मार्गदर्शन एवं नेतृत्व प्रदान कर सकेगा । अहंकारी होना और प्रशंसा का भूखा होना प्रमुख मानवीय कमजोरियाँ हैं। चाटुकार झूठी प्रशंसा द्वारा महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों का अहंकार तृप्त करके अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं। व्यक्ति जब तक सतर्क हो पाता है,  तब तक काफी देर हो चुकी होती रहती है। अतः उचित प्रशंसा एवं चाटूकारिता की विभाजन–रे...