Posts

Showing posts from April, 2020

भगवान का साक्षात्कार

       “भगवान् वेदव्यासजी ने भी कहा है की अगर तुम्हे संसार में सुखी होना हो तो इन चार बातो को ठीक से समझ लो | इन चार बातों से संपन्न होकर जगत का व्यवहार करो  …………………. “                       परम भक्ति पाना  हो, परम सुख पाना हो , परम तत्व को पाना हो , ब्रह्मज्ञान को पाना हो तो भक्त को  कैसा बनना चाहिए ?             भक्त की पहचान क्या है ? जो परमात्मा से , अकाल पुरुष से अपने विभक्त नहीं मानता – जानता वह उत्तम भक्त है | ऐसा उत्तम भक्त , परम भक्त कैसा होता है ? भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है :      अद्वेष्टा  सर्वभूतानां  मैत्र :  करुण  एव   च |        निर्ममो निरहंकारः समदु:खसुख : क्षमी ||                                       ...

जीवन में ईश्वर-प्राप्ति

परमात्म – प्राप्ति अत्यंत सरल है किन्तु गलत अभ्यास के कारण कठीन लग रही है I जब तक हमें यह बात समझ में नहीं आती की परिस्थिति जीवन नहीं है और जीवन परिस्थिति नहीं है तब तक परमपद की कुंजी नहीं मिलती I                 जीवन उसे कहा जाता है जिसे मौत छू तक न सके , जहां कोई भी दुःख , क्लेश और मुसीबत फटक  तक न सके I  परिस्थिति को मौत छू सकती है , जीवन को नहीं , किन्तु हम परिस्थिति को ही जीवन मानने की गलती कर बैठते है , इसीलिए परिस्थिति से बंध जाते है I   परिस्थितियों का बँधन ही हमें भयभीत कर देता है, आसक्त कर देता है और परेशान कर देता है I  यदि इन दोनों का भेद समझमे आ जाए तो सब दुखो की निवृत्ति हो जाए I                  अगर आप प्रत्यक्ष  रूप से यह जान लो की परिस्थिति जीवन की है तो कोई भी परिस्थिति आपको प्रभावित नहीं कर सकती I  साथ में यह लाभ भी होगा की आपका दुःख का भय चला जाएगा I  चाहे कैसी भी परिस्थिति आये, किन्तु यदि हमारी यह समझ बनी रहे की जो अवस्था आई है वह एक दिन...

सुखी, स्वस्थ एवं सम्मानित जीवन के आधार

 “उ सीका जीवन सफल है जिसके जीवन में दृढ़ता है | उसीका जीवन सफल है जिसके जीवन में सत्संग के लिए स्नेह है | उसीका मनुष्य जन्म सफल है जिसके जीवन में सादगी , सच्चाई और प्रवित्रता है , जीवन व्यसनों से मुक्त है | उसे अनुकुलताएँ बाँध नहीं सकती और प्रतिकुलताएँ डिगा नहीं सकती |”                  एक बार घूमते-घूमते कालिदास बाजार गये | वहाँ एक महिला बैठी मिली | उसके पास एक मटका था और कुछ प्यालियाँ पड़ी थी | कालिदास ने उस महिला से पूछा : ” क्या बेच रही हो ? ”           महिला ने जवाब दिया : ” महाराज ! मैं पाप बेचती हूँ | “           कालिदास ने आश्चर्यचकित होकर पूछा : ” पाप और मटके में ? “           महिला बोली : ” हाँ , महाराज ! मटके में पाप है | ”           कालिदास : ” कौन-सा पाप है ? “           महिला : ” आठ पाप इस मटके में है | मैं चिल्लाकर कहती हूँ की म...

दक्षता के लिए चाटूकारिता से बचिये

Image
    प्रभावशीलता एवं दक्षता प्राप्त करना प्रबंधन की मूल चुनौतियाँ हैं। व्यक्ति से व्यवस्था प्रभावित होती है। जैसा मुखिया होता है, संगठन वैसा ही होने लगता है। एक क्रोधी एवं अव्यवस्थित अधिकारी अपने संगठन एवं परिवेश को भी वैसा ही बना देता है, इसके  विपरीत शांतचित्त, प्रसन्न एवं सृजनशील अधिकारी अपने संगठन को प्रगति की दिशा में खींचता है। अतः  प्रभावशीलता एवं दक्षता प्राप्त करने के लिए दो दिशाओं से प्रयत्न करना चाहिए― तंत्र एवं व्यवस्था उत्तम बने तथा उसे चलानेवाला व्यक्ति  विकसित हो।      यदि व्यवस्था चलाने वाले व्यक्ति की मानवीय कमजोरियों उस पर प्रभावी होती रहेंगी तो न वह स्वतः उन्नति कर सकेगा और न ही अपने संगठन को अच्छा मार्गदर्शन एवं नेतृत्व प्रदान कर सकेगा । अहंकारी होना और प्रशंसा का भूखा होना प्रमुख मानवीय कमजोरियाँ हैं। चाटुकार झूठी प्रशंसा द्वारा महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों का अहंकार तृप्त करके अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं। व्यक्ति जब तक सतर्क हो पाता है,  तब तक काफी देर हो चुकी होती रहती है। अतः उचित प्रशंसा एवं चाटूकारिता की विभाजन–रे...

श्री राममंगल दस जी और एक भक्ता

Image
सुंदर कथा १०८ (श्री भक्तमाल –    पूज्यपाद श्री जानकीदास बाबा सरकार ने कृपा कर के कई वर्षो पूर्व इस लीला को सुनाया था, वही लीला यहां संतो की कृपा से लिखने का प्रयास कर रहा हूं – श्री अयोध्या मे एक सिद्ध कोटि के संत हुए है श्री राममंगल दास जी महाराज । वही महाराज जी के निवास स्थान के पास में एक मिथिला क्षेत्र की स्त्री रहती थी । उसके पास किसी वस्तु का संग्रह नही था , बस एक गाय के दूध से भरा लोटा और एक कपड़े में श्री रामचरित मानस जी की पोथी । पूरे दिन उसका यही काम था कि जहां भी जाती – प्रभु को रामायण की कथा सुनाती । कनक भवन जाती तो वहां चौपाइयों के रस का आस्वादन करती , कही अन्यत्र जाती तो वहां भी यही नियम था । वह स्त्री ज्यादा पढ़ी लिखी नही थी बस हिंदी पढ़ और समझ लेती थी । श्री मानस जी मे उसका दृढ़ विश्वास था । एक दिन महाराज जी रेल गाड़ी में बैठकर प्रयाग (इलाहाबाद) के माघ मेला में जा रहे थे । वह भक्ता भी उसी डिब्बे में बैठ गयी । संत महाराज जी को देखकर उसने चरणों मे प्रणाम किया और दोनों मे कुछ संवाद हुआ । महाराज जी ने पूछा – बेटी ! तुम्हारे गुरुदेव कहा विराजते हैं , गुर...

राम नाम का महात्म्य

आज स्मृति मे एक अद्भुत संत की लीला आयी- हमारे नामजापक संत की वह लीला सुनाता हूं । श्री रघुनाथ शरण बाबा एक बार संत मंडली के साथ कथा के निमित्त मुंबई आये थे । विचरण करते एक हॉस्पिटल (नाम नही लिखूंगा) सामने कोई संतप्रेमी मिला तो उससे बात कर रहे थे । हाल ही मे नया नया हॉस्पिटल बनाया था और अच्छा चलने भी लगा था । इतने में वहां का मालिक बड़ा डॉक्टर निकला और चिल्लाया – ए यहां क्या बात कर रहे हो, क्यो आये हो यहां, कामधाम होता नही बाबाजी लोगो को दिनभर राम राम करते डोलते है , राम राम करने से सब हो जाता है क्या ? संत जी ने उसको प्रेम से राम नाम का महात्म्य बताया पर वह घमंड दिखाने लगा । संत ने कहा- डॉक्टर साहब, राम नाम की शक्ति देखनी है तो ठीक है । हाथ मे जल लिया और कहां सीताराम -जल छोड़ दिया । डॉक्टर से बोले अब कुछ दिन छुट्टी ले लो, कुछ दिन यहां कोई इलाज कराने नही आएगा -ऐसा बोलकर चले गए । डॉक्टर को समझ मे आया नही और वो घर चला गया । कुछ देर मे उसके हॉस्पिटल के बाबू (सेवक) ने घर जाकर बताया कि साहब आज पता नही क्या हो गया , सारे मरीज एकदम स्वस्थ हो गए -बड़े बड़े गंभीर बीमारी में पड़े मरीज भी अचानक उ...

प्रभु शरणागत वत्सल हैं

Image
   अर्जुन को अकेले जाकर तपस्‍या करके भगवान पुरारि को प्रसन्‍न करना था। पाशुपतास्‍त्र तो प्राप्त करना ही था, देवताओं के दिव्‍यास्‍त्र भी इसी समय मिलने थे। श्रीकृष्‍ण सानुकूल होते हैं तो संयोग एवं सफलताएँ स्‍वयं आजुटती हैं। इस यात्रा में अ‍कस्‍मात पार्थ को पवन पुत्र श्रीहनुमान जी मिल गये। परस्‍पर परिचय हुआ। अर्जुन ने अभिवादन किया। दो भगवद्भक्त मिलेंगे तो उनमें स्‍वभावत: भगवच्‍चर्चा चलेगी। अर्जुन ने अपनी यात्रा का उद्देश्‍य बतलाया कि उन्‍हें कौरवों से होने वाले अनिवार्य युद्ध में दिव्‍यास्‍त्र प्राप्‍त करना है। इसके लिए तप करने वे हिमालय के इस दिव्‍य देश में जा रहे हैं। इस प्रसंग में श्रीमारूति ने मर्यादा पुरुषोत्तम का मंगलमय चरित सुनाना प्रारम्‍भ कर दिया। सेतुबन्‍ध का वर्णन सुनकर अर्जुन को आश्‍चर्य हुआ। वे बोले –र ‘श्रीरघुनाथजी अथवा उनके अनुज सौ योजन समुद्र पर अपने शरों का सेतु नहीं बना सकते थे कि नल-नील को तथा आप सबको पर्वत ढोने का श्रम करना पड़ा?’ हनुमानजी  हँसे – ‘वे सर्वसमर्थ कर तो सब कुछ सकते थे किन्‍तु बाणों के द्वारा बँधे सेतु पर इतनी...