परमात्मा का साथ

 एक दिन में हम कितनी बार परमात्मा को याद करते.. हैं? एक या दो बार ? बाकी समय में क्या हम ईश्वर को भूल जाते हैं और यही सोचते हैं कि हम कर्ता हैं। और हमारे करने से ही सब कुछ होता है? आइये, " हम परमात्मा को हर समय याद करने की कोशिश करें। निश्चित रूप से ऐसा करने वाला हर समय, परमानंद और सदा-सदा की खुशी को पा लेगा। वह समस्याओं से ऊपर उठेगा और जीवन के उतार चढ़ाव से प्रभावित नहीं होगा।

यह हमारे भीतर की ईश्वरीय शक्ति है, जो हमें चुनौतियों का सामना करने के लिए ताकत और साहस देती है। प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी समय शारीरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कभी-कभी हमें आश्चर्य होता है कि क्या हम इससे बाहर निकल सकते हैं, पर जब हम उन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर लेते हैं तो हमें हैरानी होती है कि हमने यह कैसे कर लिया? इनमें से प्रत्येक अनुभव उस उच्च शक्ति का प्रमाण है, जो हमेशा हमारे साथ रहती है। हम कभी अकेले नहीं होते। परमात्मा हमेशा हमारे साथ रहते हैं। जब भी हमें किसी चुनौती का सामना करना पड़ता है, जो हमें लगता है कि बहुत मुश्किल है, तब यह ध्यान रखना चाहिए कि हम अकेले नहीं हैं, परमात्मा का अनदेखा हाथ हमेशा हमारे साथ है। हम परमात्मा को देख तो नहीं सकते, लेकिन परमात्मा की शक्ति को अनुभव जरूर कर सकते हैं। कई बार हम भी अपने भीतर परमात्मा की उस अदृश्य शक्ति को महसूस करते हैं। दरअसल हम जितना अधिक ग्रहणशील होंगे, उस शक्ति को उतना ही अधिक महसूस कर सकते हैं। इसलिए जब भी हमें चुनौतियों का सामना करना पड़े तो उन लोगों को याद रखना चाहिए, जिनके पास और भी बड़े संघर्ष थे और वे सफलतापूर्वक उनसे बाहर निकले। जीवन की चुनौतियों का सामना, हम निडर होकर करें। हम पूरी कोशिश करें, लेकिन • परिणाम परमेश्वर की इच्छा पर छोड़ दें। यही ईश्वर का सान्निध्य पाने का तरीका है।

आइये इस बात को भगवान  कृष्ण और उद्धव जी के इस प्रसंग के माध्यम से समझने का प्रयास करते है-

 उद्धव ने कृष्ण से पूछा,

जब द्रौपदी लगभग अपना शील खो रही थी,

तब आपने उसे वस्त्र देकर द्रौपदी के शील को बचाने का दावा किया!

लेकिन आप यह यह दावा भी कैसे कर सकते हैं ?

उसे एक आदमी घसीटकर भरी सभा में लाता है,

और इतने सारे लोगों के सामने निर्वस्त्र करने के लिए छोड़ देता है!

एक स्त्री का शील क्या बचा ? आपने क्या बचाया ?

अगर आपने संकट के समय में अपनों की मदद नहीं की तो आपको आपाद-बांधव कैसे कहा जा सकता है ?

बताईए, आपने संकट के समय में मदद नहीं की तो क्या फायदा ?

क्या यही धर्म है ?"

इन प्रश्नों को पूछते-पूछते उद्धव का गला रुँध गया और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

ये अकेले उद्धव के प्रश्न नहीं हैं। महाभारत पढ़ते समय हर एक के मनोमस्तिष्क में ये सवाल उठते हैं!

उद्धव ने हम लोगों की ओर से ही श्रीकृष्ण से उक्त प्रश्न किए।

भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए बोले-

"प्रिय उद्धव, यह सृष्टि का नियम है कि विवेकवान ही जीतता है।

उस समय दुर्योधन के पास विवेक था, धर्मराज के पास नहीं।

यही कारण रहा कि धर्मराज पराजित हुए।"

उद्धव को हैरान परेशान देखकर कृष्ण आगे बोले- "दुर्योधन के पास जुआ खेलने के लिए पैसाऔर धन तो बहुत था, लेकिन उसे पासों का खेल खेलना नहीं आता था, इसलिए उसने अपने मामा शकुनि का द्यूतक्रीड़ा के लिए उपयोग किया। यही विवेक है। धर्मराज भी इसी प्रकार सोच सकते थे और अपने चचेरे भाई से पेशकश कर सकते थे कि उनकी तरफ से मैं खेलूँगा।

जरा विचार करो कि अगर शकुनी और मैं खेलते तो कौन जीतता ?

पाँसे के अंक उसके अनुसार आते या मेरे अनुसार?

चलो इस बात को जाने दो। उन्होंने मुझे खेल में शामिल नहीं किया, इस बात के लिए उन्हें माफ़ किया जा सकता है। 

लेकिन उन्होंने विवेक-शून्यता से एक और बड़ी गलती की! और वह यह- उन्होंने मुझसे प्रार्थना की कि मैं तब तक सभा-कक्ष में न आऊँ, जब तक कि मुझे बुलाया न जाए!

क्योंकि वे अपने दुर्भाग्य से खेल मुझसे छुपकर खेलना चाहते थे।

वे नहीं चाहते थे, मुझे मालूम पड़े कि वे जुआ खेल रहे हैं!

इस प्रकार उन्होंने मुझे अपनी प्रार्थना से बाँध दिया! मुझे सभा-कक्ष में आने की अनुमति नहीं थी!

इसके बाद भी मैं कक्ष के बाहर इंतज़ार कर रहा था कि कब कोई मुझे बुलाता है! भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव सब मुझे भूल गए! बस अपने भाग्य और दुर्योधन को कोसते रहे! 

अपने भाई के आदेश पर जब दुःशासन द्रौपदी को बाल पकड़कर घसीटता हुआ सभा-कक्ष में लाया, द्रौपदी अपनी सामर्थ्य के अनुसार जूझती रही!

तब भी उसने मुझे नहीं पुकारा!

उसकी बुद्धि तब जागृत हुई, जब दुःशासन ने उसे निर्वस्त्र करना प्रारंभ किया!

जब उसने स्वयं पर निर्भरता छोड़कर-

'हरि, हरि, अभयम् कृष्णा, अभयम्'-

की गुहार लगाई, तब मुझे उसके शील की रक्षा का अवसर मिला।

जैसे ही मुझे पुकारा गया, मैं अविलम्ब पहुँच गया। अब इस स्थिति में मेरी गलती बताओ ?"

उद्धव बोले-

"कान्हा आपका स्पष्टीकरण प्रभावशाली अवश्य है, किन्तु मुझे पूर्ण संतुष्टि नहीं हुई! 

क्या मैं एक और प्रश्न पूछ सकता हूँ ?"

कृष्ण की अनुमति से उद्धव ने पूछा-

"इसका अर्थ यह हुआ कि आप तभी आओगे, जब आपको बुलाया जाएगा ? क्या संकट से घिरे अपने भक्त की मदद करने आप स्वतः नहीं आओगे ?"

कृष्ण मुस्कुराए-

"उद्धव इस सृष्टि में हरेक का जीवन उसके स्वयं के कर्मफल के आधार पर संचालित होता है।

न तो मैं इसे चलाता हूँ, और न ही इसमें कोई हस्तक्षेप करता हूँ।

मैं केवल एक 'साक्षी' हूँ।

मैं सदैव तुम्हारे नजदीक रहकर जो हो रहा है उसे देखता हूँ।

यही ईश्वर का धर्म है।"

"वाह-वाह, बहुत अच्छा कृष्ण! तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप हमारे नजदीक खड़े रहकर हमारे सभी दुष्कर्मों का निरीक्षण करते रहेंगे?"

हम पाप पर पाप करते रहेंगे, और आप हमें साक्षी बनकर देखते रहेंगे ?

आप क्या चाहते हैं कि हम भूल करते रहें ? पाप की गठरी बाँधते रहें और उसका फल भुगतते रहें ?" उलाहना देते हुए उद्धव ने पूछा!

तब कृष्ण बोले- "उद्धव, तुम शब्दों के गहरे अर्थ को समझो।"


जब तुम समझकर अनुभव कर लोगे कि मैं तुम्हारे नजदीक साक्षी के रूप में हर पल हूँ, तो क्या तुम कुछ भी गलत या बुरा कर सकोगे ?

तुम निश्चित रूप से कुछ भी बुरा नहीं कर सकोगे।

जब तुम यह भूल जाते हो और यह समझने लगते हो कि मुझसे छुपकर कुछ भी कर सकते हो,

तब ही तुम मुसीबत में फँसते हो!

।। कृष्णम् वन्दे जगतगुरूम् ।।

Comments

Popular posts from this blog

ईश्वर में आस्था

श्री राममंगल दस जी और एक भक्ता