प्यार करो पर प्यार न माँगो
प्यार करो पर प्यार न माँगो,
प्यार करो पर प्यार न माँगो,,,
गैरो से क्या अपनों से भी सपनों का संसार न माँगो,,
प्यार करो पर प्यार न माँगो,,,
तुम्हे दिखाई देती है जो, बसी हुई बस्ती यारो की,,
धौखे में मत आ जाना, ये दुनियाँ है दुकानदारो की,,,
व्यवसायी से निश्चल मन का, प्रेमभरा व्यवहार न माँगो,,
प्यार करो पर प्यार न माँगो,,,
सोचो तनिक कामना अपनी, जीवन में दुःख-सुख भरती है,,
नहीं दूसरा दोषी कोई, आशा ही निराश करती है,,,
मुक्ति का उपाय सोचो, कुछ भुक्ति का भण्ङार न माँगो,,
प्यार करो पर प्यार न माँगो,,,
जिसने जगत् बनाया जग में, उसकी ही इच्छा चलती है,,
बात कभी की अलग हमेशा, दिल की दाल नहीं गलती है,,,
क्षणभंगुर विषयो से सुख का, स्थायी आधार न माँगो,,
प्यार करो पर प्यार न माँगो,,,
जग को हरि का रुप समझकर, मन में भाव भक्ति का भरदो,,
हरि की सत्ता सिंधु सरित सा, अपना अहं विसर्जित कर दो,,,
छुट जाएगा रोना, अपने होने का अधिकार न माँगो,,
प्यार करो पर प्यार न माँगो,,,
देखों फलदायी वृक्षों को, कितने नम्र रहा करते है,,
फलवाले होकर पत्थर का, कठिन प्रहार सहा करते है,,,
सीखो यह स्नेह देकर के, बदले में सत्कार न माँगो,,
प्यार करो पर प्यार न माँगो,,,
है अनेक में एक यही तो, मिलता है उपदेश यहाँ,,
सभी राम का रुप है पगले, रंक और राजेश कहाँ,,,
इसी दृष्टि से सृष्टि बदल दो, रिपु का भी प्रतिकार न माँगो,,
प्यार करो पर प्यार न माँगो,,,







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