जीवन में ईश्वर-प्राप्ति

परमात्म – प्राप्ति अत्यंत सरल है किन्तु गलत अभ्यास के कारण कठीन लग रही है I जब तक हमें यह बात समझ में नहीं आती की परिस्थिति जीवन नहीं है और जीवन परिस्थिति नहीं है तब तक परमपद की कुंजी नहीं मिलती I 
               जीवन उसे कहा जाता है जिसे मौत छू तक न सके , जहां कोई भी दुःख , क्लेश और मुसीबत फटक  तक न सके I  परिस्थिति को मौत छू सकती है , जीवन को नहीं , किन्तु हम परिस्थिति को ही जीवन मानने की गलती कर बैठते है , इसीलिए परिस्थिति से बंध जाते है I   परिस्थितियों का बँधन ही हमें भयभीत कर देता है, आसक्त कर देता है और परेशान कर देता है I  यदि इन दोनों का भेद समझमे आ जाए तो सब दुखो की निवृत्ति हो जाए I  
               अगर आप प्रत्यक्ष  रूप से यह जान लो की परिस्थिति जीवन की है तो कोई भी परिस्थिति आपको प्रभावित नहीं कर सकती I  साथ में यह लाभ भी होगा की आपका दुःख का भय चला जाएगा I  चाहे कैसी भी परिस्थिति आये, किन्तु यदि हमारी यह समझ बनी रहे की जो अवस्था आई है वह एक दिन जायेगी अवश्य, न सुखद परिस्थिति सदा टिकती है न दुखद परिस्थिति सदा टिकती है I  इस ज्ञान से सुखद परिस्थिति में आसक्ति नहीं होगी और दुखद परिस्थिति से भय नहीं होगा I भय और आसक्ति का अभाव आपके चित्त को निर्दोष , निर्द्वंद और निरहंकारी बना देगा जिससे चित्त को चैतन्यस्वरूप में प्रतिष्ठित होने का अवसर मिलेगा और चैतन्यस्वरूप में स्थिति होने से सब दुःख सदा के लिए दूर हो जायेंगे I
  
               किसीकी सुखद परिस्थिति देखकर आप यह इच्छा न करने लगना की अमुक व्यक्ति के पास बढ़िया गाडी बंगला है , मेरे पास भी हो जाए I  नहीं …. नहीं … वरन आप यह देखना की जिसके पास यह सब है , क्या वह पूर्ण सुखी है ? ऐहिक सुख – सुविधा होने से ही कोई मनुष्य पूर्ण सुखी नहीं हो जाता I  किन्तु इसका मतलब यह भी नहीं की आप आलसी हो जाओ , निराशावादी हो जाओ या पलायनवादी हो जाओ , वरन आप भी परिस्थितियों को अनुकूल बनाने की कोशिश करो I  लेकिन भीतर से समझना चाहिए की यह परिस्थिति है, आने-जाने वाली है I 
               बाल्यकाल की परिस्थिति आयी और गयी I  बाल्यकाल के खिलौने , मित्र आदि बदल गए किन्तु उनको देखने वाला साक्षी , आत्मा नहीं बदला , वही जीवन है I  परिस्थिति और शरीर जीवन नहीं है I  जीवन तो वह अहि जिस पर मृत्यु की परछाई तक नहीं पड़ सकती I  ऐसे ही बाल्यकाल से बाहर निकले तो यौवन आया I यौवन बदला तो बुढ़ापा आता है I  बुढापे से बाहर निकले तो मृत्यु आती है और मृत्यु से भी बाहर निकले तो दूसरा नया जन्म आता है I  इस प्रकार इस शरीर की अवस्थाए तो कई बदलती ही रहती है किन्तु उनको देखने वाला दृष्टा एक का एक है और वही तुम हो I  
               जब तक इस बात का ज्ञान नहीं होगा , तब तक बदलती परिस्थितियों के साथ आप अपने को भी बदलता हुआ मानते रहोगे I  जब तक परिस्थितियों और जीवन में अंतर नहीं कर पाओगे, तब तक किसी न किसी परिस्थिति की आकांक्षा करते रहोगे I  कुआरें  सोचते है  सगाई में सुख है , सगाईवाला सोचता है  शादी में सुख है , शादिवाला सोचता है की बच्चे में सुख है I  पति सोचता है की पत्नी कहने में चले तो सुखी होऊ और पत्नी सोचती है की पति कहने में चले तो सुखी होऊ परन्तु जरा देखो की जो पति-पत्नी एक-दुसरे के कहने में चलते है वे सचमुच में सुखी है क्या ?  जिनको बच्चे है वे सचमुच में सुखी है क्या  ? मुक्त है क्या ? गहराई से देखोगे तो पता चलेगा की वे भी सुखी नहीं है I  किसी भी परिस्थिति में सच्चा सुख, पूर्ण स्थिरता या पूर्ण जीवन दृष्ठिगोचर नहीं हो सकता | पूर्ण सुख तो केवल परमात्म -प्राप्ति से ही संभव है |
               यदि मनुष्य को परिस्थिति का उपयोग करना आ जाए तो वह परमात्मा के साथ एकात्मता स्थापित कर सकता है | किन्तु परिस्थिति को यदि जीवन मानने की भूल की तो परिस्थिति तुम्हे परेशान करके चौरासी लाख जन्मो के चक्कर में डाल सकती है | यह बात सर्व साधनाओ की चाबी है | यदि योगी यह समझ जाये तो उसकी भक्ति सार्थक हो जायेगी | विचारक अगर यह बात समझे तो उसका विचार सिद्ध हो जाएगा | इस बात को समझकर व्यवहार में लाये तो फिर परमात्म-प्राप्ति ज्यादा दूर नहीं रहेगी, परम सुखी होंने में कठिनाई न रहेगी |

               इस बात को समझने के लिए प्रतिदिन अभ्यास की आवश्यकता है | जो गलत अभ्यास पड़ गया है की अमुक परिस्थिति उत्पन्न होगी फिर सुखी होंगे , इस गलत अभ्यास को मिटाने के लिए मेहनत करना , उसीका नाम है साधना | साधना को यदि विचार से करोगे तो दुसरे साधनों को लम्बे समय तक करने की आवश्यकता न रहेगी |
               पहला विचार यह करना है की परिस्थिति तो आने – जानेवाली है , फिर चाहे वह हर्ष की हो या श्लोक की , रोग की हो या स्वस्थता की , भय की हो या चिंता की , किन्तु सब जानेवाली है |

               दूसरी बात यह समझनी है की दुखद परिस्थिति को हम चाहे फिर भी रोक नहीं सकते क्योंकि वह प्राकृतिक है | जैसे बुढ़ापा , मृत्यु आदि दैवी विधान है और दैवी विधान सबके मंगल के लिए ही होता है | यदि कोई भी वृद्ध न हो , किसी की भी मृत्यु न हो तो यह संसाररूपी पाठशाला चले कैसे ? पाठशाला से तो पुराने विद्यार्थी बाहर निकलते है और नए उसमे प्रवेश करते है तभी पाठशाला चलती है | 
               तीसरी बात यह  है की किसी भी परिस्थिति में सत्यबुद्धि न रखे | जब तक परिस्थिति में सत्यबुद्धि रहेगी तब तक सच्चे जीवन के दर्शन नहीं हो सकते | सच्चे जीवन का दर्शन और परमात्मा का दर्शन दोनों एक ही बात है |
               इसलिए अभ्यास ऐसा करना चाहिए की ‘ मै प्रत्येक परिस्थिति का दृष्टा हूँ ‘ यह ज्ञान हो जाये | ‘ परमात्मा की सत्ता से ही परिस्थितियाँ प्रकाशित है | उन परिस्थितियों का वर्णन और विचार मन और बुद्धि से हो सकता है | मै उनका भी साक्षी हूँ | परिस्थितियों का साक्षी परमात्मा है वही मेरा आत्मा होकर बैठा है | बदलनेवाली परिस्थितियाँ ‘ मै ‘  नहीं | बाल्यावस्था बदल गयी वह  ‘ मै ‘ नहीं था ,  यौवन बदल रहा है वह ‘ मै ‘ नहीं हूँ और बुढ़ापा बदल जाएगा वह भी ‘ मै ‘ नहीं रहूँगा | इन सब परिस्थितियों का साक्षी चैतन्य जो आत्मा है वह मै हूँ …’ ऐसा अभ्यास करने से सुख की आसक्ति और दुःख का भय मिट जाएगा और समत्वयोग प्रकट हो जाएगा | भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है :       
सुखं वा यदि  वा दू:खं स: योगी परमो मत : |
               सुख की परिस्थिति आये चाहे दुःख की परिस्थिति आये , किन्तु उसे केवल परिस्थिति समझनेवाला भक्त ही मेरे मतानुसार परम योगी है |’ 
               परिस्थिति जीवन नहीं है और परिस्थितियाँ कभी स्थायी नहीं रहती | तो फिर भय किसका और आसक्ति किससे ? दुखद परिस्थिति स्थायी नहीं है तो उससे भय कैसे और सुखद परिस्थिति को आप रोककर नहीं रख सकते फिर अहंकार और आसक्ति किसकी ? सुख की आसक्ति और दुःख का भय तुम्हारे अंत : करण को छिन्न भिन्न कर देता है | इसीलिए आप अपने-आप  पर ही कृपा करो | सुख की आसक्ति और दुःख का भय हटाओगे तो आपका ह्रदय शुद्ध होगा और शुद्ध ह्रदय में गुरुकृपा , भगवद्कृपा सहज ही प्रगट होने लगेगी | 
              जहां प्रेम होता है वहां दूसरी परिस्थिति की परवाह नहीं रहती | सांसारिक प्रेमी को भी माता-पिता , रिश्ते-नातों की परवाह नहीं रहती है | कल क्या होगा इसकी चिंता नहीं रहती | जहां प्रेम होता है वहां दूसरी परिस्थितियाँ गौण हो जाती अहि | अतः आप अपने जीवन के प्रति प्रेम करो | अपने आत्मा परमात्मा में , गुरुतत्व में प्रीती बढाओ तो बाहर की परिस्थितियों का आप पर प्रभाव नहीं पड़ेगा | यदि प्रेम करवटे लेता है तो वह प्रेम नहीं , परिस्थिति है और जहां प्रेम लगाने के बाद हटता नहीं वह परमेश्वर है , परमात्मा है | अतः आप परिस्थिति को नहीं , जीवन को , साक्षी को , सच्चिदानंद को , अपने शुद्ध – बुद्ध  स्वरुप को महत्त्व दें तो परमात्म-प्राप्ति आपके लिए सहज हो जायेगी |  

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