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श्री राममंगल दस जी और एक भक्ता

सुंदर कथा १०८ (श्री भक्तमाल –   

पूज्यपाद श्री जानकीदास बाबा सरकार ने कृपा कर के कई वर्षो पूर्व इस लीला को सुनाया था, वही लीला यहां संतो की कृपा से लिखने का प्रयास कर रहा हूं –
श्री अयोध्या मे एक सिद्ध कोटि के संत हुए है श्री राममंगल दास जी महाराज । वही महाराज जी के निवास स्थान के पास में एक मिथिला क्षेत्र की स्त्री रहती थी । उसके पास किसी वस्तु का संग्रह नही था , बस एक गाय के दूध से भरा लोटा और एक कपड़े में श्री रामचरित मानस जी की पोथी । पूरे दिन उसका यही काम था कि जहां भी जाती – प्रभु को रामायण की कथा सुनाती । कनक भवन जाती तो वहां चौपाइयों के रस का आस्वादन करती , कही अन्यत्र जाती तो वहां भी यही नियम था । वह स्त्री ज्यादा पढ़ी लिखी नही थी बस हिंदी पढ़ और समझ लेती थी । श्री मानस जी मे उसका दृढ़ विश्वास था । एक दिन महाराज जी रेल गाड़ी में बैठकर प्रयाग (इलाहाबाद) के माघ मेला में जा रहे थे ।
वह भक्ता भी उसी डिब्बे में बैठ गयी । संत महाराज जी को देखकर उसने चरणों मे प्रणाम किया और दोनों मे कुछ संवाद हुआ । महाराज जी ने पूछा – बेटी ! तुम्हारे गुरुदेव कहा विराजते हैं , गुरुद्वार (गुरुस्थान) कहां पर है तुम्हारा ? उस भक्ता ने श्री रामचरितमानस की पोथी मस्तक से लगाकर अश्रुपात करते हुए एक चौपाई कही –
गुरु यही, गुरुद्वार यही । इन्ही की सेवा मे मन लाऊं ।।
जहां जहां जाऊ ,वहां तुलसीकृत रामायण ही गाऊं ।।
यद्यपि महाराज जी सब जानते थे परंतु फिर भी महाराज ने पूछा – गुरु तो ऐसा होना चाहिए कि शिष्य की समस्त शंकाओ का समाधान करने में समर्थ हो , समस्त शास्त्रो का ज्ञाता हो । वह भक्ता बोली – ऐसी एक भी समस्या नही है जिसका श्री मनास जी समाधान न कर सके । जैसे श्रीमद्भागवत साक्षात श्रीकृष्ण का ही स्वरूप है ऐसे ही श्री रामचरितमानस भी श्री रघुनाथ जी का ही स्वरूप है । महाराज ने पूछा – यह पोथी कौनसा मंत्र देती है ? भक्ता बोली – इसमें श्री राम नाम के महात्म्या को छोड़कर और है ही क्या ? भगवान शिव भी श्रीराम महामंत्र का उच्चारण करते है । महाराज उसका भाव और श्रीमानस जी मे श्रद्धा देखकर बहुत प्रसन्न हुए । महाराज जी ने पूछा – ये दूध का लोटा लेकर ही क्यों चलती हो ? भक्ता ने कहा – अभी मेरे रघुनाथ जी बालक है , कथा सुनते सुनते भूख लग जाती है । महाराज जी ने सोचा – आखिर यह क्या कह रही है इस बात को प्रत्यक्ष देखना चाहिए ।
संतो ने कहा है – किसी सद्ग्रंथ का सेवन करना भी सत्संग ही है । श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज वाणी में कहते है – गुरु मान्यो ग्रंथ । जिसको वास्तविक महापुरुष अभी तक न मिला हो वह किसी ग्रंथ अथवा जिनमे श्रद्धा हो उनका आश्रय लेकर भजन करे। श्री रूपरसिकदेवचार्य जी ने श्री हरिव्यासदेवचार्य को गुरु रूप में स्वीकार कर लिया था और उनका श्री हरिव्यासदेवचार्य के चरणों मे दृढ़ विश्वास था परंतु उस समय श्री हरिव्यासदेवचार्य जी वैकुंठ जा चुके थे । श्री रूपरसिकदेवचार्य जी की श्रद्धा और समर्पण देखकर श्री हरिव्यासदेवचार्य जी वैकुंठ से पुनः पधारे और इन्हें दीक्षा प्रदान की । श्री जगद्गुरू तुकाराम जी ने अपने वैकुंठ गमन के बाद स्वप्न में श्री बहिणा बाई को दीक्षा प्रदान की । श्री स्वामी हितदास जी को श्री हरिवंश महाप्रभु ने इसी प्रकार कृपा की । विश्वास दृढ़ हो तो और अंतःकरण शुद्ध हो जाये तब सद्गुरु अवश्य कृपा करते है । चाहे वह ग्रंथ हो अथवा कोई पार्षद महापुरुष। इसका साक्षात उदाहरण है यह प्रसंग –
प्रयाग क्षेत्र आते ही उस भक्ता ने त्रिवेणी संगम पर स्नान किया और श्री रामचरित मानस जी को प्रणाम करके बैठ गयी । महाराज जी वृक्षो के पीछे छिपकर देखने लगे और जो देखा सो स्तब्ध होकर देखते ही रह गए । महाराज जी ने देखा कि कोई वायु नही चल रही है परंतु ग्रंथ के पन्ने ऐसे फड़फड़ा रहे है जैसे तूफान चल रहा हो । जैसे ही फड़फड़ाना रुक गया तो वहां श्री मानस जी की पोथी से एक तेजपुंज निकला और वहां स्वयं बालस्वरूप में श्री रघुनाथ जी, जानकी जी और लक्ष्मण जी दिखाई पड़े । वे तीनो बड़े प्रेम से कथा सुन रहे थे और जब उस भक्ता को लगता कि कथा सुनते सुनते बहुत देर हो गयी , उस समय वह बालको को थोड़ा गौ दुग्ध पवा देती । कथा वाचन समाप्त होनेपर वह तेजपुंज पुनः श्री मानस जी मे विलीन हो गया । महाराज जी इस लीला को देख कर धन्य धन्य हो गए और कहा कि इसका प्रेम श्रेष्ठ है – प्रेम में ऐसा अद्भुत सामर्थ्य है जिससे प्रभु वश में हो जाते है – हमे लोग सिद्ध, परमहंस, महात्मा कहते है पर प्रेम मे बडा अद्भुत सामर्थ्य है ।
श्री रघुनाथजी ने श्री शबरी माता से कहा है – हे भामिनि! मेरी बात सुन! मैं तो केवल एक भक्ति ही का संबंध मानता हूँ । प्रभु वनगमन लीला में सन्यासी के वेश में है । सन्यासी को किसीसे संबंध स्थापित करना और किसीका जूठा खा लेना उचित नही माना जाता परंतु मर्यादापुरुषोत्तम ने प्रेम के वश मर्यादा का अतिक्रमण कर दिया । उस वन मे बहुत से योगी, तपस्वी , हंस, परमहंस रहते थे जो भगवान को प्राप्त करने के लिए हजारो वर्ष की कठोर साधना में लगे रहते है परंतु भगवान उनकी ओर दृष्टिपात भी नही करते – वे तो पूछते है कि मेरी शबरी की कुटिया कहां है ? ये तो उसके सरल स्वभाव और प्रेम का ही सामर्थ्य है ।
मानस में बाबा कहते है –
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा।
सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई॥
भक्ति के मार्ग में परिश्रम नहीं है, इसमें न योग की आवश्यकता है, न यज्ञ, जप, तप और उपवास की। भक्ति के मार्ग में केवल सरल स्वभाव हो, मन में कुटिलता न हो और जो कुछ मिले उसी में सदा संतोष रखे।
भगवान शिव कहते है – हरि व्यापक सर्वत्र समाना। प्रेम ते प्रकट होय मै जाना॥ – प्रेम में ही परमात्मा को प्रकट करने का सामर्थ्य है । श्री नानकदेव कहते है – जिन प्रेम कियो तिनहि हरि पायो ।

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