संसार से विरक्ति कैसे हो
एक युवक एक महात्मा के पास नित्य आता रहता था। महात्मा उसे योग-अभ्यास एवं अन्य विद्या का ज्ञान कराते थे। कुछ दिनों के बाद शिष्य दो-तीन तक नही आया।आने पर गुरु ने कारण पूछा तो उसने बताया गुरुदेव मेरे माता पिता ने मेरा विवाह तय कर दिया है तो गुरु ने कहा तुम हमसे गए ।
फिर कुछ दिनों बाद शिष्य एक सप्ताह पश्चात आया और बताया कि उसकी शादी हो गई है। महात्मा जी ने अपने मस्ती में कहा कि तब तुम अपने माता -पिता से गये। शिष्य ने समझा की गुरुजी नाराज हैं और पूछ पड़ा गुरुजी आप हमसे रुष्ट हैं क्या ? महात्मा जी ने कहा नही हम नाराज नही हैं हम तो ऐसे ही कह रहे थे। समय बीतता रहा और फिर विवाह के बाद शिष्य का आना अब कम होने लगा और एक दिन उसने संतान प्राप्ति की सूचना दी तो गुरु ने कहा कि अब तो तुम अपने आप से भी गए ।
शिष्य कहने लगा कि गुरुजी मेरे परिवार में सभी मुझसे बहुत स्नेह करते हैं। महात्मा जी ऐसा सुनकर समझ गए कि अब मेरा शिष्य संसार मे उलझ चुका है और अपने एकमात्र उद्देश्य ईश्वरप्राप्ति से भटक गया है, ऐसा जानकर उन्होंने शिष्य से कहा कि तुम जानना चाहते हो कि तुम्हारा परिवार तुमसे कितना स्नेह करता है तो उसने कहा अवश्य।
शिष्य कहने लगा कि गुरुजी मेरे परिवार में सभी मुझसे बहुत स्नेह करते हैं। महात्मा जी ऐसा सुनकर समझ गए कि अब मेरा शिष्य संसार मे उलझ चुका है और अपने एकमात्र उद्देश्य ईश्वरप्राप्ति से भटक गया है, ऐसा जानकर उन्होंने शिष्य से कहा कि तुम जानना चाहते हो कि तुम्हारा परिवार तुमसे कितना स्नेह करता है तो उसने कहा अवश्य।
महात्मा जी कहा की तुम तो श्वास रोकने की विद्या में प्रवीण हो उस विद्या के उपयोग का समय आ गया है। अगले दिन शिष्य ने गुरुजी के अनुसार अपने श्वास रोक लिया तो घर के सभी लोग उसे मृत समझकर रोने-धोने लगे। तब किसी ने सलाह दी कि ये जिस महात्मा के पास जाता है उन्हे बुलाओ। उसी समय महात्मा जी को बुलाया गया और महात्मा जी ने अपनी योजना के अनुसार कहा अब तो इसके बचने की कोई उम्मीद बहुत कम है तो परिवार के लोग जोर-जोर से विलाप करने लगे। फिर महात्मा जी ने कहा कि मैं इतनी जल्दी हार नही मान सकता, जल्दी से एक कटोरे में दूध लाओ। दूध आने पर गुरुजी ने कहा इसमे चीनी डालो लोगो ने वैसा ही किया फिर गुरुजी दूध के कटोरे को लेकर कुछ मंत्र पढ़ा और शिष्य के सिर के चारों ओर घुमाया फिर बोले इसको बचाने का एक ही उपाय है यदि इसके परिवार में से कोई एक इस कटोरे का दूध पी ले तो ये जिंदा हो जाएगा और उसके बदले दूध पीने वाला व्यक्ति मर जाएगा। इतना सुनना था कि पिताजी रोते हुए बोले मैं इसे चाहता तो बहुत हूं पर इतना नहीं पर इतना नहीं कि अपनी जान दे दूं। माताजी बोली कि मैं तो इसे पी लेती लेकिन मेरे बाद मेरे पति की सेवा कौन करेगा मेरा धर्म बिगड़ जाएगा। इसी तरह शिष्य की प्राणप्रिय पत्नी भी बोली ये तो विधि का विधान है कोई क्या कर सकता है अब मैं अपने पिता के घर चली जाउंगी । इस प्रकार परिवार का कोई भी सदस्य वह दूध पीना स्वीकार नहीं किया और सभी ने महात्मा जी को कहा कि गुरुजी इसे आप ही पी लीजिए, आप का तो कोई परिवार भी नही है और संत का काम परोपकार करना है । संत मुस्कुराते हुए वह दूध पी गए और गाने लगे-
'उठ बेटा चल मेरे संग अब, देख लिया संसार'
इस प्रकार हमें यह शिक्षा मिलती है कि इस संसार में कोई किसी का नही है। सत्य ही है 'स्वारथ लागी करहि सब प्रीति' ।

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