कर्म और धर्म की कहानी


कर्म और धर्म की कहानी

इस कहानी में दो पात्र है देव और दनुज देव के माता-पिता शिक्षित थे। देव बचपन से ही बहुत खूबसूरत था इसलिए माता पिता ने अपने पुत्र का नाम देव रख दिया। दनुज के माता-पिता बहुत ही गरीब थे, इनका पुत्र बहुत कुरूप था इसलिए ये जिस घर मे काम करते थे उस घर के मालिक ने इनके पुत्र का नाम दनुज रख दिया, जिसका अर्थ दानव या राक्षस होता है किन्तु इनके माता-पिता को इस नाम का अर्थ नही पता था।


इस कहानी का प्रारंभ एक कार्यालय से होता है और अंत भी उसी कार्यालय में होता है। कार्यालय मे देव आफिसर का काम करता है और दनुज चपड़ासी का कार्य करता है। देव चरित्र से अहंकारी है और नास्तिक भी किन्तु अपने मुह पर मुखौटा पहने रहता है, लोगों को दिखाता है की आस्तिक है और ईश्वर पर बहु आस्था रखता है। दूसरी तरफ दनुज बहुत ही मेहनती, तर्कशील और शिक्षित है किन्तु परिस्थितियां ऐसी है की उसको चपड़ासी का कार्य करना पड़ता है। देव दनुज से जलता था क्योंकि वह उतना तर्कशील नहीं है इसलिए वह दनुज को छोटी सी गलती करने पर भी बहुत डाँटता और अन्य कर्मचरियों के सामने बेइज्जत करता रहता था। देव दनुज से अपने घर का कार्य भी करवाता था किन्तु दनुज चुप-चाप सब सहता रहता था। दनुज उसी कार्यालय में क्लर्क के लिए आवेदन किया हुआ था और परीक्षा के लिए तैयारी भी की हुई थी इसलिए उसकी मेहनत रंग लाई और वह उसी कार्यालय क्लर्क बन गया। देव अभी भी दनुज से चपरासी की तरह व्यवहार करता और दिन प्रतिदिन उसकी प्रताड़ना बढती गयी।  

 क्लर्क बनने के बाद दनुज की शादी हो गयी और उसको एक बेटा हुआ। दनुज ने अपने जीवन मे बहुत संघर्ष किया और विपरीत परिस्थितियों देखी इसलिए वह चाहता था की उसका बेटा यह सब न देखे। दनुज ने अपने बेटे का दाखिला उसी स्कूल में करवा दिया जिस स्कूल में देव का बेटा पढ़ता था। इससे देव के ताने बढ़ते गए और देव का बेटा भी स्कूल में दनुज के बेटे को तंग करने लगा। समय बीतता गया देव कार्यालय से रिटायर हो गया और दनुज उसी कार्यालय में आफिसर बन गया। 

कहते है ईश्वर की लाठी जब पड़ती है तो उसकी आवाज नहीं होती देव के कर्मों का असर उसके बेटे के भविष्य पर पड़ा और वह निकमा बन गया। दनुज अपने बेटे के इंजीनियर बनने की खुशी में कार्यालय में मिठाई वितरित करवा रहा था उसी दिन देव अपने बेटे के चपड़ासी की चिठी लेकर कार्यालय के जिस आफिसर के कमरे मे सिफारिश करने के लिए प्रवेश करता है सामने दनुज को आफिसर की कुर्सी पर बैठा पाकर बहुत रोता है, नियति ने तो अपना कार्य उसी दिन से प्रारंभ कर दिया था जिस दिन से देव ने दनुज का अपमान शुरू किया था केवल उसका परिणाम आज आया था।


निष्कर्ष केवल नाम से देव और दनुज होने से कोई भी देव या दनुज नहीं होता मनुष्य के कर्म उसको देव या दनुज बनाते है, कहानी का पात्र देव नाम होने से भी दनुज बन गया और दनुज अपने कर्मों से देव बन गया। कहानी से दूसरी सीख यह मिलती है की मनुष्य को अपने कर्मों के अनुसार फल मिलता है ईश्वर के घर देर है अंधेर नहीं, संभवतः वर्तमान में फल न मिले किन्तु भविष्य में फल निश्चित ही मिलता है यह मीठा या कड़वा हो सकता है। कहानी से तीसरी सीख यह मिलती है की कर्म का मीठा फल तब ही मिलता है जब आपके कर्म सही है न की ईश्वर की झूठी भक्ति करने से।

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